• 9691011442, 9981544667
  • kmitiwari13@gmail.com
  • विश्व सम्राट संकट मोचन हनुमान मंदिर खामबाबा टीला अशोकनगर रोड वैस नगर विदिशा

 

|| श्री राम स्तुति||

श्री राम चंद्र कृपालु भजमन हरण भाव भय दारुणम्। नवकंज लोचन कंज मुखकर,

कंज पद कन्जारुणम्।।

कंदर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरज सुन्दरम्।पट्पीत मानहु
तडित रूचि शुचि नौमी जनक सुतावरम्।।
भजु दीन बंधु दिनेश दानव दैत्य वंश निकंदनम्। रघुनंद आनंद कंद
कौशल चंद दशरथ नन्दनम्।।
सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारू अंग विभूषणं। आजानु भुज शर
चाप धर संग्राम जित खर-धूषणं।।
इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनम्।मम ह्रदय कुंज
निवास कुरु कामादी खल दल गंजनम्।।
||छंद ||
मनु जाहिं राचेऊ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर सावरों।

 करुना निधान सुजान सिलू सनेहू जानत रावरो।।
एही भांती गौरी असीस सुनी सिय सहित हिय हरषी अली।

 तुलसी भवानी पूजि पूनी पूनी मुदित मन मंदिर चली।।

।।सोरठा।। 
जानि गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।

 मंजुल मंगल मूल वाम अंग फरकन लगे।। 
|| जय श्री राम ||

 

 

श्री हनुमान चालीसा

 

-:दोहा:-

श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु
फल चारि ॥
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार । बल बुधि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेश
विकार ।।

-:चौपाई:-

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर । जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥१॥
राम दूत अतुलित बल धामा । अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥२॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमति के संगी॥३॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा । कानन कुंडल कुँचित केसा॥४॥
हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजे । काँधे मूँज जनेऊ साजे॥५॥
शंकर सुवन केसरी नंदन । तेज प्रताप महा जगवंदन॥६॥
विद्यावान गुनी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर॥७॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया । राम लखन सीता मनबसिया॥८॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहि दिखावा । विकट रूप धरि लंक जरावा॥९॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे । रामचंद्र के काज सवाँरे॥१०॥
लाय सजीवन लखन जियाए । श्री रघुबीर हरषि उर लाए॥११॥
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई । तुम मम प्रिय भरत-हि सम भाई॥१२॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावै । अस कहि श्रीपति कंठ लगावै॥१३॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा । नारद सारद सहित अहीसा॥१४॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते । कवि कोविद कहि सके कहाँ ते॥१५॥
तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा । राम मिलाय राज पद दीन्हा॥१६॥
तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना । लंकेश्वर भये सब जग जाना॥१७॥
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू । लिल्यो ताहि मधुर फ़ल जानू॥१८॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही । जलधि लाँघि गए अचरज नाही॥१९॥
दुर्गम काज जगत के जेते । सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥२०॥
राम दुआरे तुम रखवारे । होत ना आज्ञा बिनु पैसारे॥२१॥

सब सुख लहैं तुम्हारी सरना । तुम रक्षक काहु को डरना॥२२॥
आपन तेज सम्हारो आपै । तीनों लोक हाँक तै कापै॥२३॥
भूत पिशाच निकट नहि आवै । महावीर जब नाम सुनावै॥२४॥
नासै रोग हरे सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत बीरा॥२५॥
संकट तै हनुमान छुडावै । मन क्रम वचन ध्यान जो लावै॥२६॥
सब पर राम तपस्वी राजा । तिनके काज सकल तुम साजा॥२७॥
और मनोरथ जो कोई लावै । सोई अमित जीवन फल पावै॥२८॥
चारों जुग परताप तुम्हारा । है परसिद्ध जगत उजियारा॥२९॥
साधु संत के तुम रखवारे । असुर निकंदन राम दुलारे॥३०॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता । अस बर दीन जानकी माता॥३१॥
राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा॥३२॥
तुम्हरे भजन राम को पावै । जनम जनम के दुख बिसरावै॥३३॥
अंतकाल रघुवरपुर जाई । जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥३४॥
और देवता चित्त ना धरई । हनुमत सेई सर्व सुख करई॥३५॥
संकट कटै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥३६॥
जै जै जै हनुमान गुसाईँ । कृपा करहु गुरु देव की नाई॥३७॥
जो सत बार पाठ कर कोई । छूटहि बंदि महा सुख होई॥३८॥
जो यह पढ़े हनुमान चालीसा । होय सिद्ध साखी गौरीसा॥३९॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा । कीजै नाथ हृदय मह डेरा॥४०॥

दोहा

पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥

 

 

 

|| बजरंग बाण ||

दोहा :

निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान । तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं
हनुमान॥

चौपाई :

जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥
जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥
जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥
आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुरलोका॥
जाय बिभीषन को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा॥
बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा॥
अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥
लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर नभ भई॥
अब बिलंब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अंतरयामी॥
जय जय लखन प्रान के दाता। आतुर ह्वै दुख करहु निपाता॥
जै हनुमान जयति बल-सागर। सुर-समूह-समरथ भट-नागर॥
ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिहि मारु बज्र की कीले॥
ॐ ह्नीं ह्नीं ह्नीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर सीसा॥
जय अंजनि कुमार बलवंता। शंकरसुवन बीर हनुमंता॥
बदन कराल काल-कुल-घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक॥
भूत, प्रेत, पिसाच निसाचर। अगिन बेताल काल मारी मर॥
इन्हें मारु, तोहि सपथ राम की। राखु नाथ मरजाद नाम की॥

सत्य होहु हरि सपथ पाइ कै। राम दूत धरु मारु धाइ कै॥
जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुख पावत जन केहि अपराधा॥
पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत कछु दास तुम्हारा॥
बन उपबन मग गिरि गृह माहीं। तुम्हरे बल हौं डरपत नाहीं॥
जनकसुता हरि दास कहावौ। ताकी सपथ बिलंब न लावौ॥
जै जै जै धुनि होत अकासा। सुमिरत होय दुसह दुख नासा॥
चरन पकरि, कर जोरि मनावौं। यहि औसर अब केहि गोहरावौं॥
उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई। पायँ परौं, कर जोरि मनाई॥
ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥
ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल-दल॥
अपने जन को तुरत उबारौ। सुमिरत होय आनंद हमारौ॥
यह बजरंग-बाण जेहि मारै। ताहि कहौ फिरि कवन उबारै॥
पाठ करै बजरंग-बाण की। हनुमत रक्षा करै प्रान की॥
यह बजरंग बाण जो जापैं। तासों भूत-प्रेत सब कापैं॥
धूप देय जो जपै हमेसा। ताके तन नहिं रहै कलेसा॥ 
 
दोहा : प्रेम प्रतितही कपि भजै, सदा धरै उर ध्यान।
         तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करै हनुमान।
दोहा :

उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै, पाठ करै धरि ध्यान।
बाधा सब हर, करैं सब काम सफल हनुमान॥

 

 

 

|| श्री राम रक्षा स्तोत्रम ||

विनियोगः
अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः। श्री सीतारामचंद्रो देवता ।
अनुष्टुप्‌ छंदः। सीता शक्तिः। श्रीमान हनुमान्‌ कीलकम्‌ । श्री
सीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः ।
चरितं रघुनाथस्य शतकोटि प्रविस्तरम्। एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्।।
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्। जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितं।।
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम्। स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्।।
रामरक्षां पठेत प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम्। शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः।।
कौसल्येयो दृशो पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुति। घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः।।
जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः। स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ
भग्नेशकार्मुकः।।
करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित। मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः।।
सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः। उरु रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृताः।।
जानुनी सेतुकृत पातु जंघे दशमुखांतकः। पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामअखिलं वपुः।।
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृति पठेत। स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्।।
पातालभूतल व्योम चारिणश्छद्मचारिणः। न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः।।
रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन। नरौ न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च
विन्दति।।
जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्। यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः।।
वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत। अव्याहताज्ञाः सर्वत्र लभते जयमंगलम्।।
आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः। तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो
बुधकौशिकः।।

आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम्। अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान स नः
प्रभुः।।
तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ। पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ।।
फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ। पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।।
शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्। रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ।।
आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशा वक्ष याशुगनिषङ्गसङ्गिनौ। रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः
पथि सदैव गच्छताम।।
सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा। गच्छन् मनोरथान नश्च रामः पातु
सलक्ष्मणः।।
रामो दाशरथी शूरो लक्ष्मणानुचरो बली। काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः।।
वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः। जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः।।
इत्येतानि जपन नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः। अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न
संशयः।।
रामं दुर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम। स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नरः।।
रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं
धार्मिकम।।
राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथतनयं श्यामलं शांतमूर्तिं वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं
रावणारिम।।
रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे। रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः।।
श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम। श्रीराम राम रणकर्कश राम राम। श्रीराम राम शरणं
भव राम राम।।
श्रीराम चन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि श्रीराम चंद्रचरणौ वचसा गृणामि। श्रीराम चन्द्रचरणौ
शिरसा नमामि श्रीराम चन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये।।

माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः । सर्वस्वं मे रामचन्द्रो
दयालुर्नान्यं जाने नैव जाने न जाने।।
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मज। पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम्।।
लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथं। कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं
शरणं प्रपद्ये।।
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं
श्रीराम दूतं शरणं प्रपद्ये।।
कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम। आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम।।
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्। लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्।।
भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम्। तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम्।।
रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै
नमः।।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोस्म्यहं रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम
मामुद्धराः।।
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्त्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने।।

|| इति श्री राम रक्षा स्त्रोतम ||

 

 

 

||आरती हनुमान जी की||

 

आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।
जाके बल से गिरिवर कांपे। रोग दोष जाके निकट न झांके।।
अंजनि पुत्र महाबलदायी। संतान के प्रभु सदा सहाई।।
दे बीरा रघुनाथ पठाए। लंका जारी सिया सुध लाए।।
लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई।।
लंका जारी असुर संहारे। सियारामजी के काज संवारे।।
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आणि संजीवन प्राण उबारे।।
पैठी पताल तोरि जमकारे। अहिरावण की भुजा उखाड़े।।
बाएं भुजा असुर दल मारे। दाहिने भुजा संतजन तारे।।
सुर-नर-मुनि जन आरती उतारे। जै जै जै हनुमान उचारे।।
कंचन थार कपूर लौ छाई। आरती करत अंजना माई।।
लंकविध्वंस कीन्ह रघुराई। तुलसीदास प्रभु कीरति गाई।।
जो हनुमानजी की आरती गावै। बसी बैकुंठ परमपद पावै।।

 

 

 

रामाष्टकम

 

भजे विशेषसुन्दरं समस्तपापखण्डनम्।
स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव राममद्वयम् ॥ १ ॥
जटाकलापशोभितं समस्तपापनाशकम्।
स्वभक्तभीतिभंजनं भजे ह राममद्वयम् ॥ २ ॥
निजस्वरूपबोधकं कृपाकरं भवापहम्।
समं शिवं निरंजनं भजे ह राममद्वयम् ॥ ३ ॥
सदाप्रञ्चकल्पितं ह्यनामरूपवास्तवम्।
निराकृतिं निरामयं भजे ह राममद्वयम् ॥ ४ ॥
निष्प्रपञ्चनिर्विकल्पनिर्मलं निरामयम्।
चिदेकरूपसंततं भजे ह राममद्वयम् ॥ ५ ॥
भवाब्धिपोतरूपकं ह्यशेषदेहकल्पितम्।
गुणाकरं कृपाकरं भजे ह राममद्वयम् ॥ ६ ॥
महावाक्यबोधकैर्विराजमनवाक्पदैः।
परब्रह्म व्यापकं भजे ह राममद्वयम् ॥ ७ ॥
शिवप्रदं सुखप्रदं भवच्छिदं भ्रमापहम्।
विराजमानदैशिकं भजे ह राममद्वयम् ॥ ८ ॥
रामाष्टकं पठति यः सुकरं सुपुण्यं व्यासेन भाषितमिदं श्रृणुते मनुष्यः।
विद्यां श्रियं विपुलसौख्यमनन्तकीर्ति सम्प्राप्य देहविलये लभते च मोक्षम् ॥ ९ ॥
॥ इति श्रीव्यासविरचितं रामाष्टकं संपूर्णम् ॥
।।इति संपूर्णंम्।।

 

 

 

||आरती श्री राम की||

 

आरती हो रही है, श्री राम की, झांकी निरखे नजरिया सुखधाम की (4), सुखधाम
की, हो रामा सुख धाम की(2) आरती हो रही है श्री राम की, झांकी निरखे नजरिया
सुखधाम की,(2) [1] कृपा कार हैं, कृपा कार है, जग
आधार हैं जग आधार हैं, प्रेम भवन पाप गमन भक्तों के दिलदार हैं| होती आई
पूजा है इनके नाम की, (2) आरती हो रही है श्री राम की, झांकी निरखे नजरिया
सुखधाम की, [2] खाली हाथ हैं, खाली हाथ हैं, कुछ ना साथ है,
कुछ ना साथ है, मांग वचन, रख लो शरण, मांग दया की नाथ है,(2) गान जिव्हा
सके गुण तेरे काम की,(2) आरती हो रही है, श्री राम की, झांकी निरखे नजरिया
सुखधाम की,(2)
[3] प्रीति जो करे,2– ध्यान नित धरे, 2– क्यों न उसके सर से सारी वीपदा टले,2–
दीनबन्धु स्वामी सुख के ललाम की,2— आरती हो रही श्री रामकी, आरती हो रही
है, सुखधाम की , झांकी निरखे नजरिया सुखधाम|
[4] जन्म जब मिले, हम जहाँ पले, मेरे मन का फूल प्रभु चरण मे ही खिले, प्रेम
पनपे कला जनपथ के सभी काम की, आरती हो रही है, श्री राम की, झांकी निरखे
नजरिया सुखधाम| सुखधाम की, हो रामा सुख धाम की| आरती हो रही है, श्री राम
की, झांकी निरखे नजरिया सुखधाम की——————-