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  • विश्व सम्राट संकट मोचन हनुमान मंदिर खामबाबा टीला अशोकनगर रोड वैस नगर विदिशा

 

चरण तीर्थ विदिशा

चरण तीर्थ विदिशा शहर की एक प्रमुखधार्मिक स्थल है। चरण तीर्थ बेतवानदीकेबीच में स्थित एक टापू है।इस टापू मेंशंकर जी का प्राचीन मंदिर देखने के लिएमिलता है। यहां पर दो मंदिर बने हुए हैं। दोनों ही मंदिर बहुत सुंदर है। इन मंदिरों केबारे में कहा जाता है, कि यह मंदिर बहुत प्राचीन है और इस मंदिर का आकार शंकर जी की पिंडी के आकार के समान है। इस जगह के बारे में यह भी कहा जाता है, कि यहां पर श्री राम जी के चरण पड़े थे। इसलिए इस जगह को चरण तीर्थ के नाम से जाना जाता है। यहां पर आपको श्री राम जी की चरण पादुका भी देखने के लिए मिलेगी। यह जगह बहुत सुंदर है। यह बहुत बड़ा टापू है और यहां पर पेड़ पौधे भी लगे हुए हैं। यहां पर लोग नहाने का मजा भी लेते हैं। यहां पर बेतवा नदी का बहुत सुंदर दृश्य देखने के लिए मिलता है। चरण तीर्थ शनि देव मंदिर के आगे स्थित है। हम लोग यहां पर अपनी स्कूटी से गएथे। यहां पर मुक्तिधाम भी बना हुआ है। जहां पर लोगों का अंतिम संस्कार किया जाता है। हम लोगों ने यहां पर अपनी गाड़ी खड़ी की। चरण तीर्थ में हम लोग पैदल गए। यहां पर बेतवा नदी पर पुल बना हुआ है। इस पुल के द्वारा हम चरण तीर्थ तकपहुंच सकते हैं। यहां पर हम शंकर जी के पहला मंदिर में घूमने के लिए गए। यहमंदिर बहुत ही सुंदर था और एक ऊंचे मंडप पर बना हुआ था। मंदिर में जाने केलिए सीढ़ियां बनी हुई थी। सीढ़ियों के दोनों तरफ दो दीपस्तंभ रखे हुए थे। यह बहुत सुंदर लग रहे थे। इस मंदिर का डिजाइन बहुत ही सुंदर था और यह देखने में बहुत ही सुंदर लग रहा था। गर्भ ग्रह में शंकर जी का शिवलिंग विराजमान था, जो बहुत ही आकर्षक लग रहा था। यहां से आपको बेतवा नदी का सुंदर दृश्य भी देखने के लिए मिल जाएगा। इसी टापू में एक प्राचीन  स्मारक भी देखने के लिए मिलता है। यह स्मारक यहां पर  खंडहर अवस्था में है।  हम लोग शिवजी का पहला मंदिर घूमने के बाद, शिवजी के दूसरे मंदिर में घूमने के लिए गए। दूसरे मंदिर में बेतवा नदी का बहुत सुंदर बहाव देखने के लिए मिलता है।यहां पर बहुत सारे लोग बेतवा नदी में नहाने का मजा ले रहे थे। यहां पर पूरे पुरुष लोग ही थे, जो नहा रहे थे। हम लोग मंदिर के ऊपर गए। यह मंदिर भी बहुत सुंदर है और गर्भ ग्रह में शिवलिंग विराजमान है। यहां पर बाहर आपको राम जी के चरण चिन्ह देखने के लिए मिलते हैं। इस मंदिर के बाहर परिसर से देखेंगे, तो आपको शिवजी की पिंडी के आकार का देखने के लिए मिलता है। यहां के पंडित जी से हमारी बातहुई और उन्होंने हम लोगों को इस मंदिर के बारे में बहुत सारी जानकारी दी। इस मंदिर का निर्माण 10 वीं शताब्दी में हुआ है और यह मंदिर बहुत पुराना है और यहां के जो भी राजा रहे थे, उन्होंने इस मंदिर का निर्माण करवाया है। पंडित जी से बात करने के बाद, हम लोग नीचे आए। तो नीचे हम लोगों को कुछ प्राचीन मूर्तियां देखने के लिए मिले। यहां पर जब बेतवा नदी में पानी बढ़ता है, तो पानी इस टापू तक भी आ जाता है। यहां पर मिट्टी जम गई थी, जो इतनी कठोर थी, कि टूट नहीं रही थी और यह मिट्टी बिल्कुल बारीक मिट्टी थी। हम लोगों ने प्राचीन मूर्तियों को देखा और बेतवा नदी के दूसरी तरफ, इस टापू के दूसरी तरफ एकऔर मंदिर था। आप वहां पर भी जाना चाहते हैं, तो जा सकते हैं। वहा पर जाने के लिए पुल बना हुआ है, जिसके माध्यम से आप बेतवा नदी के दूसरी तरफ जाकर उस मंदिर में भी घूम सकते हैं। यहां पर हम लोग कुछ देर तक रहे। यहां पर हम लोगों को मोर की आवाज भी सुनाई दी थी। मगर मोर दिखाई नहीं दिया। यह टापू बहुत बड़ा है, तो यहां पर मोर भी रहते होंगे। यहां पर अच्छा लगता है और आप जब भी विदिशा आते हैं, तो यहां पर भी आप आकर घूम सकते हैं।

 

विदिशा का विजय मंदिर(बीजा मंडल )

 

 

 

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से लगभग 60 किलोमीटर (किमी) दूर स्थित हैविदिशा। यहाँ एक ऐसा ही हिन्दू धर्म स्थल है, जो लोगों के लिए पर्यटन का स्थान बन कर रह गया है लेकिन वास्तविकता में प्राचीन काल में यह भारत केविशालतम मंदिरों में से एक था। हम बात कर रहे हैं, विदिशा के विजय मंदिर की,जिसकी विशालता के कारण मुगल आक्रांता औरंगजेब ने इसे तोप से उड़वा दिया था। लेकिन अनेकों इस्लामी आक्रमणों के बाद आज भी मंदिर के अवशेष बचे हुए हैं और आश्चर्य की बात यह है कि सेन्ट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत बनने वाली नई भारतीय संसद की बनावट बिल्कुल इस मंदिर के समान ही है।

 

*विदिशा के सूर्य मंदिर का इतिहास*

 
 

दरअसल विदिशा का विजय मंदिर सूर्य भगवान को समर्पित था। चालुक्य राजाओं ने अपनी शौर्यपूर्ण विजय को अमर बनाने के लिए विजय मंदिर का निर्माण कराया था। चूँकि चालुक्य वंशी राजा स्वयं को सूर्यवंशी मानते थे, ऐसे में उन्होंने यह विशाल मंदिर सूर्य भगवान को समर्पित किया। मंदिर के निर्माण का श्रेय चालुक्यवंशी राजा कृष्ण के प्रधानमंत्री वाचस्पति को जाता है। इसके बाद 10वीं- 11वीं शताब्दी के दौरान परमार शासकों द्वारा मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया। हालाँकि मंदिर ने कई बार इस्लामी आक्रमण भी झेला, जिसके कारण मंदिर क्षतिग्रस्त भी हुआ। ऐसे में मराठा शासकों के द्वारा भी मंदिर में जीर्णोद्धार कराए जाने के प्रमाण मिलते हैं।

 

खजुराहो के मंदिरों से भी विशाल

 

विजय मंदिर के अवशेषों के अध्ययन से यह जानकारी मिलती है कि यह मंदिर खजुराहो के प्रसिद्ध मंदिरों से भी कहीं अधिक विशाल और समृद्ध था, साथ ही इस मंदिर में की गई नक्काशी भी उस दौर की सर्वश्रेष्ठ कलाकारी मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि विजय मंदिर की ऊँचाई लगभग 100 थी और यह मंदिर आधा मील इलाके में फैला हुआ था। आज भी मंदिर का जो अवशेष है, वह एक ऊँचे बेस पर स्थापित है। मंदिर में उस दौर की सर्वश्रेष्ठ वास्तुकला की जानकारी मिलती है। मंदिर के दक्षिणी भाग की खुदाई करने पर मुख्य द्वार की विशाल चौखट प्राप्त हुई। इस पर शंख की बहुत सुन्दर कलाकृति उत्कीर्णित की गई है। इसके अलावा जिस चबूतरे पर मंदिर का निर्माण किया गया है, वहाँ पत्थरों पर अनेकों देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ निर्मित की गई हैं। मंदिरों के स्तंभों को यक्ष की आकृतियों से सुसज्जित किया गया है।

 

(बीजा मंडल 

 

 

 

चिरौल वाली माता(हिंगलाज माता )

।। श्री हिंगलाज माता चिरौल वाली माता मंदिर ।।

यह मंदिर दोनों नदी के मध्य वैस नगर विदिशा में स्थापित है। माता हिंगलाज देवी का मंदिर बहुत ही प्राचीन है। यहां पर श्री गौरी माता और श्री गणेश की स्वयंभू प्रतिमा है। इस मंदिर को लोग चिरौल वाली माता के नाम से भी जानते हैं। यह स्थान कई सिद्ध संतों की तपोभूमि है। यहां पर कई ने तपस्या की है मंदिर प्रांगण में श्री गौरी गणेश के मंदिर के अलावा श्री दादाजी श्री दुख भंजन श्री हनुमान जी महाराज एवं भगवान शिव अपने परिवार के साथ एवं भैरो जी महाराज के साथ मंदिर प्रांगण अन्य तीन संतों की समाधि अभी बनी हुई है जिसमें श्री श्री एक सौ 1008 श्री सिद्ध बाबा एवं श्री श्री 1008 श्री ईश्वरानंद जी ब्रह्मचारी जी महाराज एवं श्री श्री 1008 श्री राम छबीले दास जी महाराज की समाधि एवं सभी संतो की प्रतिमा भी स्थापित हैं और अनेकों सिद्ध संतों ने यहां पर तपस्या की है इस मंदिर पर वर्ष भर धार्मिक अनुष्ठान चैत्र नवरात्रि एवं सर्दी नवरात्र में 108 दुर्गा सप्तशती के पाठ ब्राह्मणों के द्वारा किए जाते हैं एवं गुप्त नवरात्रि में भी दुर्गा सप्तशती के पाठ किए जाते हैं यहां पर वर्ष भर में कई भंडारे आदि होते रहते हैं इस मंदिर का 2017 में जीर्णोद्धार अनेक भक्तों के सहयोग से किया गया है एवं श्रीरामचरितमानस का अखंड पारायण निरंतर आयोजित है। यहां पर सभी भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं इस मंदिर के पुजारी आचार्यश्री रितेश व्यास विदिशा के हैं।(हिंगलाज माता 

 

विश्व सम्राट संकट मोचन श्री हनुमान मंदिर

बेसनगर में बेस नदी के निकट वीरान स्थान में प्राचीन चबूतरे पर श्री हनुमान जी की छोटी सी मडिया बनी हुई थी। यहां के निवासी तेल और घी में घोलकर सिंदूर हनुमान जी को लगाते रहते थे। जिसके कारण प्रतिमा को कभी-कभी कुत्ते भी अपना मुंह लगा देते थे। सन 2001 में जब श्री हनुमान जी की कृपा से नेस्ठिक हनुमान भक्त श्री श्री 108 महात्यागी जी श्री राम नारायण दास जी महाराज का यहां आगमन हुआ। और उन्होंने यह निर्गम स्थान देखकर महाराज जी के मन को बहुत दुख हुआ। हनुमान जी की प्रेरणा से महाराज जी उसी छोटी सी मडिया में जहां हनुमान जी विराजमान थे। उन्हीं की सेवा करने के लिए रुक गए। कुछ दिन बाद महाराज जी ने अपने गुरुदेव को यहां के लिए आमंत्रित किया। और उनके गुरुदेव यहां पधारे।और उन्होंने यहाँ बहुत कठोर तप किया।जैसे कि उन्होंने भीषण सर्दी में जलधारा के द्वारा तप किया जिसमें 108 मिट्टी के घड़े रात्रि में भरकर रख दिया करते थे फिर सुबह स्नान किया करते थे। इसके बाद महाराज जी के गुरुदेव ने श्रीराम महायज्ञ किया, इसके कई वर्षों तक महाराज जी उसी छोटी सी मडिया की पूजा करते रहे। इसके बाद हनुमान जी की प्रेरणा से महाराज जी ने शिव मंदिर का निर्माण कराया। जहां आज भगवान शिव अपने परिवार के साथ विराजमान हैं। इसके बाद महाराज जी ने लगभग 3 वर्ष श्रीरामचरितमानस का अखंड पारायण करवाया, उस समय महाराज जी अपनी तब साधना में रहते थे। फिर महाराज जी ने स्वयं हनुमान जी की प्रेरणा से श्री रामचरितमानस का पारायण ही 108 किया। सन सन 2008 में महाराज जी ने श्रद्धालुओं के द्वारा मंदिर का निर्माण कार्य कराया। अनेक संतों और ब्राह्मणों के द्वारा श्रीराम महायज्ञ कर 2009 में श्री हनुमान जी की प्रतिमा का कला हरण कर पुनः प्राण प्रतिष्ठा कराई गई यहां पर अखंड श्री राम नाम संकीर्तन और गौ सेवा सेवा कई वर्षों से निरंतर चल रही है यहां पर सभी भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं

जय श्री राम

 

 

विदिशा:  श्री राधा रानी

विदिशा: विदिशा के नंदवाना स्थित श्री राधा अष्टमी का मंदिर है और आज पूरे देश में राधा अष्टमी का पर्व जोर-शोर से मनाया जा रहा है. विदिशा का ऐतिहासिक मंदिर की खासियत है कि मंदिर के पट वर्ष में सिर्फ एक बार ही खुलते हैं. बाकी वर्षभर मंदिर की गुप्त पुजारी मंदिर के अंदर ही पूजा करते हैं. MP के ऐतिहासिक राधा मंदिर पहुंची उमा भारती, बोलीं- विदिशा हिंदुओं का गढ़ रहा है गौरतलब है कि बरसाना से पुजारी संप्रदाय के लोग कई वर्षों पहले राधा जी को एक टोकरी में लेकर बरसाना मथुरा से चले थे. क्योंकि उस समय मुगलों के आक्रमण के कारण पूजा और मंदिर पर विपदा आन खड़ी थी. तभी से पुजारी संप्रदाय के लोग पैदल ही एक टोकरी में राधा जी की मूर्ति रख कर चुपचाप रातों-रात वहां से निकले थे और यहां विदिशा आकर नंदवाना में एक छोटी सी कुटिया में श्री राधा जी की पूजा अर्चना शुरू की गई. आज राधा अष्टमी के पर्व पर इस मंदिर के पट सुबह 4:00 बजे खुल जाते हैं.

वृंदावन से लाई गई है प्राचीन प्रतिमा

दरअसल जो प्रतिमाएं विदिशा के वृंदावन गली स्थित मंदिर में विराजमान हैं. वह प्रतिमाएं 1669 से पहले वृंदावन में जमुना जी के किनारे राधा रंगीराय नाम से स्थापित मंदिर में विराजमान थी, यानि जो प्रतिमा विदिशा में है वह पहले जमुना जी के किनारे थी. तब 9 अप्रैल 1669 को औरंगजेब बादशाह ने एक फरमान जारी किया था. जिसमें पूजा स्थल और सारे मंदिरों को ध्वस्त करने का आदेश जारी हुआ था. उस क्रम में इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया था. मंदिर पर करीब 6 से 7 हमले किए गए. तब पुजारी संप्रदाय के पूर्वज लोग प्रतिमाओं को बक्से में चोरी छिपे लेकर निकल पड़े थे

18 से 20 साल दिशाहीन चले

वहां से 1698 से 1707 के बीच काफी अंतराल वहां से चलने में हो गए. बताते है कि पुजारी संप्रदाय के लोग कम से कम 18 से 20 साल दिशाहीन चले थे. कई जंगलों से दुर्गम पत्थरों को पार किया. कोई दिशा नहीं थी कि कहां जाना है. प्रतिमाओं को ले लेकर बहुत कष्ट सहन करना पड़े. तब विदिशा में आकर उनको एक दिशा प्रतीत हुई. फिर यहां आकर विदिशा में वियावान जंगल में जो किले के बाहर था. बाहर कोई बस्ती भी नहीं थी. यहां मूर्ति की स्थापना की गई. कोई और आक्रमक न हो इसी डर की आशंका को लेकर पुजारी संप्रदाय के लोगों ने भक्तों के दर्शन पर रोक लगा दी. फिर परिवार के लोग ही पूजा करने लगे. इसी क्रम में राधाअष्टमी के दिन ही मंदिर खुलता बाकि साल भर बंद रहता. ये परंपरा लगभग 150 वर्षों से चली आ रही है. पुजारियों की 13वीं पीढ़ी यहां सेवा में संलग्न है.

राधा जी की सहेलियां भी विराजमान 

नंदवाना स्थित वृदांवन गली में राधा रानी मंदिर में राधाजी की 9 इंच की अष्टधातु की प्राचीन प्रतिमा के अलावा राधावल्लभ जी सहित ललिता, विशाखा, चित्रा, चंपक, लता आदि सहेलियां भी विराजमान हैं.

 

श्री बाला जी धाम मेहगाॅव

श्री बाला जी की लीला से हम और आप अनभिज्ञ नहीं है| विदिशा से लगभग 12 किलो मीटर दूर प्राचीन:- श्री बाला जी धाम स्थान है| जब मेहगाॅव के पूर्वज रहने आए थे तभी चबूतरे पर श्री बाला जी को प्रितिष्ठित कराया | लगभग 700 बर्ष पुराना स्थान है | यहाँ 20 बर्ष से श्रीरांमचरित्र मानस का अखंड रायण निरंतर पाठ चल रहा है | प्रति बर्षानुसार बसंत पंचमी पर श्री राम चरित मानस की बड़ी धाम सोभा यात्रा निकली जाती है | प्रति मंगलबार एवं शनिवार को यहाँ पर भूत, प्रेत, पित्र बढ़ा का निबारन होता है| यहाँ आने जाने बाले भक्तों के द्वारा यहाँ प्रति मंगलबार एवं शनिवार को भंडारा भी होता है| प्रति मंगलबार एवं शनिवार को बहुत ही धूम धाम से महा आरती का आनंद लाभ भी श्रद्धालु मिलता है| यहाँ पर भक्त बड़ी दूर दूर से आते आते है और जो भी मनोकामना ले आते है, सभी की मनोकामना पूर्ण होते समय नहीं लगता |

 
 

 

श्री कृषीवलेश्वर महामृत्युञ्जय महादेव मंदिर

मड़िया कलॉ जिला-विदिशा मध्यप्रदेश।

भगवान श्री कृषीवलेश्वर महामृत्युञ्जय महादेव एवं अष्टदलीय दिव्य शिवालय की दिव्य महिमा।
“कृषीवलानां ईश्वर: य:स: कृषीवलेश्वर:”अर्थात किसानों के ईश्वर हैं जो वह कृषीवलेश्वर महादेव।
प्रिय किसान बंधुओं सहित सहित समस्त सनातन धर्मावलंबी विश्ववासियों के कल्याणार्थ सादर समर्पित यह शिवालय एक सिद्ध व दिव्य रुप में प्रतिष्ठित किया गया है।भारतीय सनातन संस्कृति में प्रतीकों का अत्यधिक महत्व है। यहाँ अनेक प्रतीकों के माध्यम से अपने मनोभिलाषित लक्ष्यों कि पूर्ति हेतु अपने इष्ट की उपासना – आराधना का विधान है। इसी क्रम में अष्टदल कमल एक दिव्य, शाश्वत -सांस्कृतिक प्रतीक है। कमल भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही तथ्यों का प्रतीक माना गया है। यह श्रृंगार एवं वैराग्य तथा सृष्टि व प्रलय के रूप में वर्णित होता है। यह असीम -अनंत आकाश के साथ प्राणी के सूक्ष्म अन्तः कारण का भी प्रतीक है। इसे जल, पृथ्वी, आकाश, अग्नि,वायु, सूर्य, चंद्रमा एवं ब्रह्माण्ड के तत्व के रूप में भी स्वीकारा गया है। शास्त्रकारों के अनुसार यह पवित्रता, निर्मलता, कोमलता,सृजन,जीवन, सौंदर्य, सुरभि एवं अमरता का प्रतीक है। शोभा, स्नेह, आकर्षण,दिव्यता, प्रेम, ज्ञान, ऊर्जा, मंगलिता, भव्यता, शीतलता आदि इसके शुभ गुण हैं। कमल के इन्हीं गुणों के कारण उसे विभिन्न धर्मों में सम्मानपूर्वक प्रतिष्ठा मिली है। यही वजह है कि इसका महत्त्व वैदिक काल से लेकर आज के समय तक अक्षुण्ण है। पुराणों में तो कमल की महान महिमा गाई ही गई है, साथ ही ऋग्वेदादि चारों वेदों में भी कई स्थानों पर अष्टदलीय उत्पल का उल्लेख आया है। वेदों में भगवान विष्णु के नाभिकमल से सृष्टिकर्ता वृम्हा की उत्पत्ति का वर्णन है। वाजस्नेयी संहिता में कमल पृथ्वी का द्योतक है।
कैवल्योपनिषद् में भी कमलाकृति का वर्णन आया है ।इस आकृति के गर्भगृह में एकांत में पवित्र होकर,सुखासन से बैठकर भक्तिपूर्वक गुरु को नमन करके शोकरहित होकर हृदय कमल में अपने इष्ट का चिंतन करने का उल्लेख है। ब्राह्मणोपनिषद् के मतानुसार लोगों को कर्मफल तथा सौभाग्य देने वाले भगवान वामदेव अष्टदल कमल में सदैव निवास करते हैं। श्रीमद्भागवत् गीता में कमल की निर्मलता एवं अलिप्तता को प्रकट किया गया है – गीता के अनुसार जो व्यक्ति अपने आप को ईश्वर में समर्पित करते हुए आसक्ति का त्याग कर शुभ कार्य करता है, वह पापों से उसी प्रकार लिप्त नहीं होता जिस प्रकार जल में रहते हुए भी कमल पत्र उसमें कभी लिप्त नहीं होता। श्री सूक्त में मातालक्ष्मी का पद्मिनी आदि नामों से वर्णन किया गया है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भगवान् श्रीराम को नवकंज लोचन कंजमुख, करकंज पद कंजारुणं के रूप में चित्रित किया है। कमल कि गणना सात्विक आयुधों में भी की जाती है। ब्रह्मा,लक्ष्मी,गायत्री, भगवान् बुद्ध, शिव आदि देवता कमलासन प्रिय कहलाते है। यंत्रविधान के अनुसार श्रीयंत्र नाम का एक दिव्य अष्टदलीय यंत्र सर्वकामनाओं की पूर्ति हेतु जगत प्रसिद्ध है। स्त्रियों को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति व दिव्य संतान की प्राप्ति हेतु अष्टदल कमल साधना वरदान है। अतःइन प्रमाणों के आधार पर हम कह सकते हैं कि हमारे सनातन धर्म में अष्टदलीय कमलाकृति की अनंत महिमा गाई गई है और निश्चय ही यह सर्वमनोकामनाओं की पूर्ति में परम सहायक सिद्ध हो सकता है। श्री गुरु कृपा से अष्टदल कमल की इस दिव्य महिमा का आश्रय लेकर भगवान शिव की विशेष अष्टमूर्तियों को नमन करते हुए लगभग 100 वर्ष पुराने पीपल वृक्ष के समीप निर्मित मंदिर में पहले से ही विराजमान श्री संकटमोचन हनुमानजी महाराज के पावन संरक्षण में हमारे पावन ग्राम मड़ियॉ कलॉ में अष्टधातु से निर्मित एवं गौघृतपूरित सिद्ध शिखर कलश से सुशोभित अष्टदलीय कमलाकृति लिए हुए एक दिव्य शिवालय की स्थापना लोक कल्याण हेतु डंडीर गौत्रीय परम पुनीत रघुवंशी परिवार के नैमित्तिक सहयोग से सानंद सम्पन्न की गई है। साथ ही समस्त तीर्थों के जल के माध्यम से व वैदिक मंत्रों के द्वारा समस्त तीर्थों का आवाहन कर एक सिद्ध शिवकूप की स्थापना भी लोक कल्याण हेतु शिवालय परिसर में की गई है। जिसके माध्यम से श्रृद्धालु जन समस्त तीर्थों के जल से स्नान व शिव अभिषेक आदि का पुण्य लाभ प्राप्त कर सकें। अत्यंत महत्वपूर्ण बात यह भी है कि गुरु पुष्य योग में ही इस मंदिर के निर्माणार्थ भूमि पूजन हुआ था, तथा इस पुनीत शिवालय में प्रतिष्ठित नर्मदेश्वर शिवलिंग यजमान परिवार की पूर्ण निष्ठा, समर्पण व सजगता के चलते ओंकारेश्वर तीर्थ से गुरु-पुष्य योग व सर्वार्थ सिद्धि अमृतसिद्धि योग में ओंकारेश्वर के ही एक व्राम्हण देवता से मूल्य नहीं अपितु ससंकल्प दक्षिणा देकर आशीर्वाद स्वरुप प्राप्त किया गया और इसी दिव्य मुहूर्त में रातों-रात मड़िया कलॉ स्थित शिवालय तक लाया गया था। उपरांत अगले गुरुपुष्य योग में ही हेमाद्रि संकल्प,दशविध स्नान, प्रायश्चित कर्म,नांदिश्राद्ध व यज्ञशाला निर्माण हेतु भूमि पूजन एवं ध्वजारोहण आदि के साथ इस पुनीत आयोजन का शुभारंभ भी भगवद्कृपा से किया गया था।
और अब दिव्य शिवरात्रि महापर्व के शुभ अवसर पर शिवालय में विधिवत् विराजित होकर भगवान श्री कृषीवलेश्वर महामृत्युञ्जय महादेव प्रिय कृषक महानुभावों सहित समस्त सनातन धर्मावलंबी विश्ववासियों के लिए कल्याणकारी सिद्ध हों।इस कामना के साथ शिवरात्रि महापर्व की हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाइयां।
।।श्री शिवार्पण तिथि।।
श्री महाशिवरात्रि पर्व संवत्-2077
श्री अयोध्यानाथ श्री भवानीशंकर भगवान की महती अनुकंपा, कुलदेवता कुलदेवी, श्रीगुरुजन, एवं पूर्वजों के परम कृपा आशीर्वाद से प्रिय कृषक महानुभावों सहित समस्त सनातन धर्मावलंबी विश्ववासियों के कल्याणार्थ यह दिव्य शिवालय भगवान श्री “कृषीवलेश्वर महामृत्युञ्जय महादेव”के श्री चरणों में सादर समर्पित है।यह दिव्य शिवालय समस्त सनातन धर्मावलंबी विश्ववासियों के लिए कल्याणकारी आनंददायक, मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला,व हर प्रकार से मंगलकारी सिद्ध हो।इस कामना के साथ श्री महादेव के श्री चरणों में कोटि-कोटि डण्डवत् प्रणाम।
श्री कृषीवलेश्वर महामृत्युञ्जय महादेव मंदिर मड़िया कलॉ जिला-विदिशा मध्यप्रदेश।
एक बार दर्शन करने कृपया अवश्य पधारें।

 

श्री दादाजी मनोकामना पूर्ण सिद्ध श्री हनुमान मंदिर

श्री हनुमान जी महाराज का मंदिर मध्यप्रदेश के विदिशा शहर के रंगई गांव में विदिशा नवीन कलेक्ट्रेड से भोपाल – विदिशा मार्ग पर मात्र 500 मीटर की दूरी पर स्तिथ है..
श्री हनुमानजी की प्रतिमा दादाजी के स्वरूप में स्तिथ है। श्री दादा जी का यह मंदिर 200 वर्ष पूर्व का है, जबकि यह दादाजी महाराज की प्रतिमा लगभग 1000 वर्ष पूर्व की है|
श्री दादाजी महाराज सभी भक्तो की है सार्थक मनोकामना को पूर्ण करते है| यह मंदिर विदिशा के लोगो के लिए एक विशेष आस्था का केंद्र है ..
मंदिर में करीब 50 वर्षो से निरंतर श्री राम नाम संकीर्तन चल रहा है
एवम मंदिर में हर वर्ष हनुमान जन्म महोत्सव के दिन एक करोड़ हनुमान चालीसा का पाठ एवम भव्य विशाल नगर भंडारा होता है..
प्रति मंगलवार को मंदिर परिसर में भव्य सुंदरकांड का पाठ होता है मंदिर…।